हरियाणा: समाज में अक्सर खेती और ट्रैक्टर को पुरुषों का कार्य क्षेत्र माना जाता है, लेकिन भिवानी के आर्य नगर के रहने वाली बबीता ने इन रूढ़ियों को अपने ट्रैक्टर के पहियों तले कुचल दिया है। हाल ही में जब 33 वर्षीय बबीता खुद ट्रैक्टर चलाकर 120 क्विंटल सरसों लेकर ढीगावा मंडी पहुंची, तो वहां मौजूद हर शख्स उनकी हिम्मत देख दंग रह गया।
17 सालों से संभाल रही है गृहस्ती और खेती का कमान
बबीता की यहां यात्रा संघर्ष और स्वावलंबन की मिसाल है। उनके पिता रामफल, जो भारतीय सेना में थे और कुश्ती के नेशनल चैंपियन भी रहे, पिता के निधन के बाद 2009 में घर की पूरी जिम्मेदारी बबीता के कंधों पर आ गई। इकलौती संतान होने के नाते उन्होंने न केवल अपनी बुजुर्ग मां रामप्यारी का सहारा बनी, बल्कि अपनी पुस्तक 16 एकड़ जमीन को भी बंजारा नहीं होने दिया।
मां और b.Ed की पढ़ाई, पर मिट्टी से जुड़ाव रहा अटूट
शिक्षा के क्षेत्र में भी बबीता पीछे नहीं रही। उन्होंने राजनीति शास्त्र में एम ए ( MA) और लोहारू के नेशनल कॉलेज से बीएड ( B.Ed ) की डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षित होने के बावजूद उन्होंने नौकरी की जगह खेती को ही अपना करियर चुना।
बचपन से ही पिता के साथ खेतों में काम करने के कारण खेती मेरे लिए कठिन नहीं, बल्कि सहज काम बन गया है। __ बबीता
मंडी में आकर्षण का केंद्र बनी ट्रैक्टर वाली किसान
ढिगावा मंडी में आमतौर पर पुरुष किसानों का ही बोलबाला रहता है, लेकिन जब बबीता सरसों से भरी ट्राली लेकर गेट पर पहुंची, तो कर्मचारियों से लेकर व्यापारियों तक ने उनके जज्बे को सलाम किया।
. कुल फसल: 120 क्विंटल सरसो।
. सरकारी खरीद: मेरी फसल मेरा ब्योरा। पोर्टल के माध्यम से 99 क्विंटल की बिक्री।
. शेष हिस्सा: निजी बोली के तहत विक्रया
निजी जीवन का त्याग और समर्पण
33 साल की उम्र में जहां लोग अपने भविष्य के लिए सपने बुनते हैं, बाबित ने अपनी मां किसी और खेतबाड़ी कोई अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उन्होंने अब तक शादी नहीं की है ताकि वह अपनी मां की देखभाल कर सके और खेतों की देखभाल में कोई कमी ना आए।
खेतों के बीच बने घर में रहकर बबीता आज उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मनिर्भर बनने का सपना देखती हैं।
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