ज्योतिबा फुले: जिन्होंने कुरूतियों को मिटाकर समाज को नयी रह दिखाई

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महात्मा ज्योतिराव फुले (1827-1890) 19वीं सदी को एक महान भारतीय समाज सुधारक, विचारक और क्रन्तिकारी कार्यकर्ता थे, जिन्होंने महिला शिक्षा, दलित उठ्यान और जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ, आजीवन संघर्ष किया। जिन्होंने दलितों पिछड़ों और महिलाओं की शिक्षा व समानता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोजना और 1873 में संयशोधक समाज की का व उनके प्रमुख कार्यों में से हैं उनकी बायोपिक फुले (प्रतीक गांधी और पत्रलेखा अभिनीत) उनके इन्ही संघर्षों को दर्शाती है।

महात्मा ज्योतिबा फुले के प्रमुख कार्य (विस्तृत विवरण)

महिला शिक्षा के प्रेणता
उन्होंने नारी शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। महिला और अपनी पत्नी को भारत की पहली खोला फुले के साथ मिलकर उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल 1848 में अपनी पत्नी सावत्रीबाई शिक्षिका बनने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने छुआछुत, जातिधर्म भेदभाव और रूढ़िवादी परम्पराओं का कड़ा विरोध किया। 24 सितम्बर 1873 को उन्होंने सत्यशोधक समाज (सत्य की खोज करने वाला समाज) की स्थापना की, जिसका उदेश्य दलितों और निम्न वर्गों को सामाजिक न्याय दिलाना था। दलितों की समानता : उन्होंने समाज में दलित शब्द का प्रयोग किया और अछूत माने जाने वाले वर्ग के लिए काम किया। उनके अनुसार, शिक्षा के बिना शूद्रों का विनाश निश्चित है।

उन्होंने विधवाओं की दयनीय स्थति को सुधारा और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। साथ ही, उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई और इसके खिलाफ कड़े कानून की मांग की।
फुले एक निडर लेखक थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में गुलामगिरी (1973) तृतीय रत्न छत्रपति शिवाजी और किसान का कोड़ा) शामिल हैं, जिनमे उन्होंने सामाजिक कुरुतियों पर प्रहार किया। उनके विचार आज भी शिक्षा, समानता और सशक्तिकरण के लिए करते हैं, जिनमे विद्या, नैतिकता और सामाजिक समानता मुख्य हैं।

ज्योतिबा फुले के प्रमुख अनमोल विचार
समानता, शिक्षा
स्त्री-पुरुष समानता
सामाजिक सुधार
जातिवाद, न्याय

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