वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी और आसपास के जिलों में गेहूं की फसल इस समय अंतिम चरण में है। इसी बीच कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को महत्वपूर्ण सलाह दी है। उनका कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण गेहूं की पैदावार पर असर पड़ सकता है। यदि किसान समय पर सिंचाई और देखभाल नहीं करेंगे तो उत्पादन में करीब 20 से 25 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मार्च के महीने में तापमान सामान्य से अधिक होने पर गेहूं की फसल पर हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ जाता है। इस स्थिति में पौधे का विकास प्रभावित होता है और दाने पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर पड़ता है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि इस समय हर 18 से 20 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई जरूर करें। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और फसल को गर्मी से बचाने में मदद मिलती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अधिक पानी देने से भी नुकसान हो सकता है, इसलिए जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जिन खेतों में नमी कम है, वहां सिंचाई के साथ-साथ खेत की नियमित निगरानी भी जरूरी है। किसानों को फसल में किसी भी प्रकार की बीमारी या कीट लगने की स्थिति में तुरंत कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए।
इसके अलावा विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि किसान खेतों में जैविक खाद और संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करें। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल बेहतर तरीके से विकसित होती है।
वाराणसी सहित पूर्वांचल के कई जिलों में गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। ऐसे में वैज्ञानिकों की यह सलाह किसानों के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि किसान इन सुझावों का पालन करते हैं तो बढ़ते तापमान के बावजूद फसल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे मौसम और तापमान को ध्यान में रखते हुए फसल प्रबंधन करें, ताकि बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके और किसानों की आय पर किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
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