राष्ट्रपति प्रोटोकॉल विवाद: ममता बनर्जी पर उठे सवाल, सियासत तेज

News

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राज्य दौरे के दौरान निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या राज्य सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री स्वागत के लिए मौजूद नहीं था। इस मुद्दे को लेकर अब राजनीति तेज हो गई है और इसे राष्ट्रपति के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है।


क्या है पूरा मामला?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पश्चिम बंगाल में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में शामिल होने पहुंची थीं। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह कहा कि तय प्रोटोकॉल के अनुसार उनके स्वागत के लिए मुख्यमंत्री या राज्य सरकार का कोई मंत्री मौजूद नहीं था।

राष्ट्रपति ने यह भी नाराज़गी जताई कि कार्यक्रम स्थल अपेक्षाकृत छोटा था। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इससे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए तय प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए।


ममता बनर्जी का जवाब

विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह राष्ट्रपति का पूरा सम्मान करती हैं।

उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रपति कई बार राज्य में कार्यक्रमों के लिए आती हैं तो हर बार मुख्यमंत्री का उपस्थित होना संभव नहीं होता। ममता बनर्जी के अनुसार उस समय वह एक धरने में शामिल थीं और जिस कार्यक्रम का जिक्र किया जा रहा है, उसकी जानकारी उन्हें नहीं थी।

मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रपति के कार्यक्रम को राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है।


प्रोटोकॉल को लेकर बहस

राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। सामान्यतः जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या अन्य संवैधानिक पदाधिकारी किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं तो मुख्यमंत्री या राज्य सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री स्वागत के लिए उपस्थित रहता है।

हालांकि यह एक परंपरागत शिष्टाचार माना जाता है, लेकिन कई मामलों में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में राज्य सरकार का अन्य प्रतिनिधि भी स्वागत करता है।


राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज

इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रपति के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक रूप से उछाला गया विवाद बता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों को लेकर अक्सर राजनीतिक बहस तेज हो जाती है, जिससे विवाद और बढ़ जाता है।


What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *