हलवाई की बेटी रुपांशी ने नेशनल कुश्ती में जीता गोल्ड, ‘बादाम रगड़ा’ चटाई विरोधियों को धूल…

Uttarakhand

“लड़कियां कुश्ती नहीं लड़तीं…” कभी सिलाना गांव के अखाड़े में अकेली लड़की देखकर ताने मारने वाले लोगों को आज देश की इस जांबाज बेटी ने अपने खेल से करारा जवाब दिया है। झज्जर के सिलाना गांव की बेटी रुपांशी (इशु) ने नेशनल कुश्ती चैंपियनशिप में अपनी फौलादी ताकत का लोहा मनवाते हुए स्वर्ण पदक (Gold Medal) पर कब्जा जमा लिया है। बेहद साधारण परिवार से आने वाली रुपांशी के पिता गांव में ही हलवाई का काम करते हैं। बेटी ने अखाड़े में देश भर से आए पहलवानों को धूल चटाकर अपने पिता की तरह पूरे देश की झोली में कामयाबी की मिठास घोल दी है। गोल्ड मेडल जीतकर जब रुपांशी अपने गांव लौटीं, तो पूरे सिलाना में ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के साथ उनका एक ऐतिहासिक नागरिक अभिनंदन किया गया।

शौक से शुरू हुआ सफर, ‘ताने’ बने तरक्की की सीढ़ी

अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद चैंपियन पहलवान रुपांशी ने अपने संघर्ष के उन दिनों को याद किया, जब अखाड़े की मिट्टी में उन्होंने पहला कदम रखा था गांव में जब नया-नया अखाड़ा खुला, तो रुपांशी महज 9 साल की उम्र में शौक-शौक में वहां पहुंच गई थीं। शुरुआत में वह पूरे अखाड़े में अकेली लड़की थीं। लोग बातें बनाते थे कि “लड़की होकर लड़कों के खेल में क्या करेगी?” लेकिन रुपांशी के माता-पिता समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी के पीछे चट्टान बनकर खड़े रहे। इससे पहले रुपांशी रोहतक में हुई स्टेट चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल (तीसरा स्थान) जीत चुकी थीं, लेकिन अपनी कमियों को सुधारते हुए उन्होंने इस बार नेशनल में सीधे गोल्ड मेडल पर झट्टा मारा।

पारंपरिक हरियाणवी डाइट और 6 घंटे की कड़ी मेहनत

रुपांशी की इस फौलादी ताकत और फुर्ती के पीछे उनकी सालों की कड़ी मेहनत और शुद्ध देसी खानपान है। वह आज के युवाओं की तरह फास्ट फूड और पिज्जा-बर्गर से कोसों दूर हैं: रुपांशी रोजाना सुबह 3 घंटे और शाम को 3 घंटे (कुल 6 घंटे) अखाड़े में पसीना बहाती हैं। उनकी डाइट में दूध, दही, घी, चूरमा और खीर मुख्य रूप से शामिल हैं। इसके अलावा, मैट पर प्रैक्टिस खत्म करने के ठीक बाद वह नियमित रूप से अपनी ऊर्जा के लिए ‘बादाम रगड़ा’ पीती हैं। रुपांशी सिर्फ अखाड़े की ही चैंपियन नहीं हैं, बल्कि पढ़ाई को भी पूरा समय देती हैं। उन्होंने हाल ही में 12वीं कक्षा की परीक्षा 60% अंकों के साथ पास की है।

पिता बनाते हैं मिठाई, भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं रुपांशी रुपांशी के परिवार की पृष्ठभूमि बेहद साधारण है। उनके पिता तिलक राज गांव में ही हलवाई का काम करते हैं और मां एक साधारण गृहणी हैं। दो बहनों और एक बड़े भाई में सबसे छोटी रुपांशी ने अपनी खेल प्रतिभा से साबित कर दिया कि बेटियां अगर ठान लें, तो कोई भी मुकाम उनसे दूर नहीं है।

गुरुओं का मार्गदर्शन और अगला लक्ष्य: एशियन चैंपियनशिप के ट्रायल्स

रुपांशी ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय कोच अमित कुमार को दिया, जिन्होंने सिलाना अखाड़े में उनकी प्रतिभा को तराशा। इसके साथ ही खलीफा पहलवान कली राम, कदम कोच और पहलवान राजबीर उर्फ सांडा के मार्गदर्शन ने उन्हें मैट पर मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया। अब रुपांशी की नजरें 14 जून को होने वाले एशियाई चैंपियनशिप के ट्रायल्स पर टिकी हैं। उनका एक ही सपना और जिद है— देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराना और मेडल जीतना।

गांव आगमन पर आयोजित ‘प्रतिभा सम्मान समारोह’ में सरपंच राकेश कुमार, पूर्व पार्षद हरेंद्र सिलाना, जोहरी पहलवान सहित भारी संख्या में ग्रामीणों और खेल प्रेमियों ने अपनी लाडली बेटी को सिर-आंखों पर बिठाया और देश का नाम रोशन करने के लिए ढेर सारा आशीर्वाद दिया।

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