उत्तराखंड: नीतियों की खिलवाड़ और लाचारी का दंश!

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उत्तराखंड, देवताओं की इस धरती को केवल “पर्यटन स्थल” और “सेना की भर्ती का गढ़” समझने की भारी भूल हो रही है। यह वह राज्य है जहाँ के लोगों ने अलग राज्य की माँग के लिए अपने खून से इतिहास लिखा, लेकिन आज यही राज्य नीतिगत उपेक्षा और खोखले वादों का शिकार है। आँकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं कि उत्तराखंड के साथ क्या हो रहा है।

युवाओं का रोष: रोजगार के नाम पर खिलवाड़

उत्तराखंड का युवा सरकारी नौकरियों के लिए तरस रहा है। राज्य सरकार की “रोजगार मेलों” का ढोंग देखिए:

  • बेरोजगारी दर: CMIE के आँकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में बेरोजगारी दर लगभग 6.7% है, जो राष्ट्रीय औसत से अक्सर ऊपर रहती है। यह आँकड़ा पहाड़ों में और भी भयावह है।
  • रिक्त पदों का अंबार: राज्य सरकार के अपने आँकड़े बताते हैं कि विभिन्न विभागों में लगभग 50,000 से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। शिक्षक, डॉक्टर, पटवारी – हर जगह कमी। सवाल है, इन पदों को भरने में इतनी देरी क्यों?
  • उद्योगों का झूठ: औद्योगिक नीतियों के नाम पर पहाड़ों को छोड़कर केवल मैदानी इलाकों में उद्योग लगाए गए। परिणाम? पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा। 2011 से अब तक, राज्य के 1000 से अधिक गाँव विरान हो चुके हैं। क्या यही है “विकास”?

पलायन: एक सन्नाटे में डूबता राज्य

सरकारी फाइलों में चमकते उत्तराखंड और जमीनी हकीकत में जूझते उत्तराखंड के बीच एक गहरी खाई है।

  • गाँवों का सूना पड़ना: राज्य आयोजना विभाग के अनुसार, 1991 से 2011 के बीच, 734 गाँव पूरी तरह से खाली हो गए। यह सिलसिला आज भी जारी है। स्कूल, अस्पताल, सड़कों का अभाव – युवा मजबूर है शहरों की ओर रुख करने के लिए।
  • महिलाओं पर बोझ: पलायन का सबसे बड़ा दंश महिलाओं को झेलना पड़ रहा है। वे खेती, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की जिम्मेदारी अकेले संभाल रही हैं। सरकार की “महिला सशक्तिकरण” की बयानबाजी यहाँ धरी की धरी रह जाती है।

पर्यावरण: बलिदान की जा रही है विरासत

उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल और नदियाँ हैं, लेकिन नीतियाँ इन्हें नष्ट करने पर आमादा हैं।

  • चारधाम रोड प्रोजेक्ट: इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए लगभग 50,000 से अधिक पेड़ों का कटाव हुआ है। भूस्खलन और पर्यावरणीय असंतुलन का खतरा बढ़ा है। क्या विकास की कीमत पर्यावरण से बड़ी है?
  • आपदा प्रबंधन: दावे और हकीकत: 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली आपदा के बाद भी, राज्य का आपदा प्रबंधन तंत्र कमजोर ही बना हुआ है। चेतावनी प्रणालियाँ अधूरी हैं और बचाव दलों के पास संसाधनों की कमी है।

सवाल सीधा और स्पष्ट है:

क्या उत्तराखंड केवल चुनावों के समय वोटों का “बैंक” है?
क्या यहाँ के लोगों को केवल तभी याद किया जाता है जब देश को सीमा पर सैनिक चाहिए या पर्यटकों को “प्रकृति का आनंद” लेना है?
क्या उत्तराखंड की “देवभूमि” की छवि के पीछे छुपाकर इसकी वास्तविक समस्याओं को अनदेखा किया जाता रहेगा?

यह लेख कोई शिकायत नहीं, एक चेतावनी है।

उत्तराखंड के लोगों का धैर्य टूट रहा है। जिस जुनून और जिजीविषा के साथ उन्होंने अलग राज्य का सपना देखा था, वही जुनून अब नीतिगत उपेक्षा के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए तैयार है। समय आ गया है कि उत्तराखंड को “छुट्टियाँ बिताने की जगह” नहीं, बल्कि एक गंभीर राज्य के रूप में देखा जाए। आँकड़े सबूत हैं, और सबूतों के आगे सरकार के दावे बेमानी हैं। अब बस हो चुका है। अब और नहीं।

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