देहरादून: उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण और बाघों की संख्या बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी-दक्षिणी क्षेत्र में बाघों की स्थायी आबादी विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को नया बल मिला है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से पांच और बाघों को राजाजी लाने की मंजूरी दे दी है।
वन विभाग के अनुसार, दूसरे चरण में तीन बाघिन और दो बाघों को कॉर्बेट से राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य पश्चिमी क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक प्रजनन को प्रोत्साहित करना है। अधिकारियों का मानना है कि इससे आने वाले वर्षों में यहां बाघों की स्थायी और संतुलित आबादी विकसित हो सकेगी।
राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी हिस्से में बाघों की मौजूदगी बढ़ाने के लिए वर्ष 2020 में बाघ पुनर्वास परियोजना की शुरुआत की गई थी। पहले चरण के तहत वर्ष 2020 से 2025 के बीच कॉर्बेट से कुल पांच बाघों को यहां स्थानांतरित किया गया। इनमें तीन बाघिन और दो बाघ शामिल थे। सभी बाघों को स्वास्थ्य परीक्षण के बाद सैटेलाइट रेडियो कॉलर पहनाकर जंगल में छोड़ा गया था, ताकि उनकी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर लगातार निगरानी रखी जा सके।
हालांकि इस परियोजना को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। वर्ष 2024 में एक बाघिन द्वारा चार शावकों को जन्म देने से वन विभाग की उम्मीदें बढ़ी थीं, लेकिन बाद में दो शावकों का गुलदार द्वारा शिकार किए जाने की पुष्टि हुई। वहीं दो अन्य शावकों का अब तक पता नहीं चल पाया है। इसके अलावा, पहले चरण में लाए गए पांच बाघों में से तीन के पार्क सीमा से बाहर निकल जाने की भी आशंका जताई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजाजी का पश्चिमी क्षेत्र बाघों के लिए बेहद उपयुक्त आवास है। यहां पर्याप्त शिकार, जल स्रोत और वन क्षेत्र मौजूद हैं। बावजूद इसके, सड़कें, चीला नहर और अन्य मानव निर्मित अवरोधों के कारण लंबे समय तक बाघों का प्राकृतिक आवागमन बाधित रहा। यही वजह रही कि यह क्षेत्र धीरे-धीरे बाघ विहीन हो गया था।
वर्तमान में राजाजी टाइगर रिजर्व में करीब 55 बाघ मौजूद हैं, जिनमें अधिकांश पूर्वी क्षेत्र में पाए जाते हैं। पूर्वी क्षेत्र का सीधा संपर्क कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से होने के कारण वहां बाघों की संख्या अधिक है। अब नए बाघों के आगमन से पश्चिमी-दक्षिणी क्षेत्र में भी बाघों की मजबूत आबादी विकसित होने की उम्मीद है, जिससे जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव पर्यटन दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
वन अधिकारियों का कहना है कि दूसरे चरण की यह परियोजना राजाजी टाइगर रिजर्व को देश के प्रमुख बाघ आवासों में और मजबूत पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यदि यह प्रयास सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिमी क्षेत्र भी बाघों की सुरक्षित और स्थायी शरणस्थली बन सकता है।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
