श्रमिक परिवारों को बड़ी राहत: 10 लाख तक कैशलेस इलाज को कैबिनेट की मंजूरी, 24 घंटे हेल्पलाइन भी होगी शुरू

Delhi

दिल्ली के श्रमिक परिवारों के लिए बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में हुई दिल्ली कैबिनेट बैठक में श्रमिक स्वास्थ्य योजना को मंजूरी दे दी गई है। इस योजना के तहत लाखों निर्माण श्रमिकों और उनके परिवारों को अब गंभीर बीमारियों में भी कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी।

सरकार के अनुसार, इस योजना का लाभ दिल्ली के करीब 2.70 लाख पंजीकृत निर्माण श्रमिकों और उनके लगभग 10 लाख परिवारजनों को मिलेगा। योजना के तहत इलाज की सीमा 10 लाख रुपये तक तय की गई है और पूरी प्रक्रिया कैशलेस होगी।


श्रमिकों को मिलेगा 10 लाख तक कैशलेस इलाज

योजना के तहत प्रत्येक पंजीकृत श्रमिक को सूचीबद्ध अस्पतालों में 2 लाख रुपये तक का व्यक्तिगत उपचार और परिवार के लिए 10 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध होगा। इससे श्रमिक वर्ग को इलाज के लिए आर्थिक बोझ से बड़ी राहत मिलेगी।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा पूरी तरह कैशलेस होगी, जिससे मरीजों को इलाज के समय किसी प्रकार की अग्रिम राशि देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।


मोबाइल मेडिकल यूनिट और 24 घंटे हेल्पलाइन

योजना के तहत श्रमिकों की सुविधा के लिए कई नई स्वास्थ्य सेवाएं भी शुरू की जाएंगी। इनमें मोबाइल मेडिकल यूनिट, मुफ्त जांच सुविधा और 24 घंटे चलने वाली टोल-फ्री हेल्पलाइन शामिल हैं।

इसके अलावा, निर्माण स्थलों और श्रमिक बहुल इलाकों में नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर भी लगाए जाएंगे, ताकि बीमारियों का समय रहते पता चल सके और इलाज शुरू किया जा सके।


कामकाजी परिस्थितियों से होने वाली बीमारियों पर फोकस

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बताया कि निर्माण श्रमिकों को अक्सर धूल, धुएं, रसायनों और भारी मशीनों के बीच काम करना पड़ता है। इससे सिलिकोसिस, सांस संबंधी रोग और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है।

इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए यह योजना तैयार की गई है, ताकि श्रमिकों को समय पर इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।


डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड से होगी निगरानी

योजना के तहत सभी लाभार्थियों का डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसके लिए एक आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम विकसित किया जाएगा, जिससे इलाज की प्रक्रिया और सुविधाओं की निगरानी आसान हो सके।

सरकार का अनुमान है कि इस योजना पर हर साल लगभग 200 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। अधिकारियों का कहना है कि यह योजना श्रमिक वर्ग के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा कवच साबित होगी।

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