नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में लगातार गिरते भूजल स्तर और बढ़ते जल संकट को देखते हुए दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) अब सख्त कदम उठाने की तैयारी में है। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए पहले व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसके बावजूद यदि लोग नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो भविष्य में बिजली के बिल के माध्यम से जुर्माना लगाने जैसे प्रस्तावों पर भी विचार किया जा रहा है।
दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में केवल 16,007 घरों और संस्थानों ने ही रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हर मानसून में करोड़ों लीटर वर्षा जल बिना उपयोग के नालियों में बह जाता है, जबकि इसे संरक्षित कर भूजल स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है।
भूजल संकट को देखते हुए अब 100 वर्ग मीटर या उससे बड़े सभी प्लॉटों पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया है। इससे पहले 500 वर्ग मीटर से बड़े भूखंडों के लिए यह व्यवस्था लागू थी, लेकिन वर्ष 2019 में नियमों को और सख्त करते हुए इसका दायरा बढ़ाया गया। नियमों के प्रभावी पालन के लिए दिल्ली जल बोर्ड ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC), एमसीडी और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के साथ संयुक्त निगरानी समिति भी गठित की है।
अगस्त 2025 में जारी नई गाइडलाइन के तहत रेन वॉटर हार्वेस्टिंग पिट्स को स्टॉर्म वॉटर ड्रेन के पास बनाने से बचने, पहली बारिश के पानी को बाईपास करने और भूजल की निगरानी के लिए पाइजोमीटर लगाने जैसी व्यवस्थाओं को भी शामिल किया गया है। अब तक दिल्ली की 174 सरकारी इमारतों में यह प्रणाली लागू की जा चुकी है।
दिल्ली जल बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल लोगों को जागरूक करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, नियमों का पालन न करने वाली सोसाइटियों और संस्थानों पर पहले से दी जा रही 10 प्रतिशत बिल छूट वापस ली जा रही है। भविष्य में इसे 50 प्रतिशत तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी विचार चल रहा है, हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। इसके अलावा, लगातार नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ जल कनेक्शन काटने जैसी कार्रवाई भी की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वर्षा जल संरक्षण को गंभीरता से नहीं अपनाया गया, तो आने वाले वर्षों में राजधानी को और गहरे जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि पर्यावरण और भविष्य की जल सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण कदम है।
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