दिल्ली-एनसीआर में इन दिनों घरेलू सहायिकाओं (मेड्स) की कमी ने लोगों की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के चलते बड़ी संख्या में कामगार अपने गृह राज्य लौट गए हैं, जिससे अचानक कामगारों की उपलब्धता घट गई है और इसका सीधा असर उनके वेतन पर देखने को मिल रहा है।
कामगारों की कमी से बढ़ी परेशानी
चुनाव के दौरान मतदान करने के लिए बड़ी संख्या में घरेलू सहायिकाएं पश्चिम बंगाल लौट गईं। इससे दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियों में कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो गया है। जिन घरों में रोजमर्रा के काम के लिए सहायिकाओं पर निर्भरता थी, वहां लोगों को खुद ही झाड़ू-पोंछा, बर्तन और खाना बनाने जैसे काम करने पड़ रहे हैं।
वेतन बढ़ाने की मांग तेज
कामगारों की कमी का फायदा उठाते हुए जो सहायिकाएं अभी भी काम कर रही हैं, उन्होंने अपने वेतन में बढ़ोतरी की मांग शुरू कर दी है। कई जगहों पर 20% से 50% तक सैलरी बढ़ाने की मांग सामने आई है। इससे मध्यम वर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ता नजर आ रहा है।
सोशल मीडिया पर भी चर्चा तेज
नोएडा के एक निवासी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर इस स्थिति को हल्के-फुल्के अंदाज में साझा किया। उन्होंने बताया कि जैसे ही बंगाली कामगार चुनाव के लिए वापस गईं, बाकी सहायिकाओं ने मौके का फायदा उठाकर अपनी फीस बढ़ा दी।
‘नई दरें नहीं मानीं तो काम छोड़ देंगे’
कई घरेलू सहायिकाओं ने साफ तौर पर कह दिया है कि अगर उनकी नई वेतन दरें स्वीकार नहीं की गईं तो वे भी काम छोड़ देंगी। इससे सोसायटी के लोगों में चिंता और बढ़ गई है।
समान रेट तय करने की मांग
स्थिति को देखते हुए कई अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) से यह मांग उठने लगी है कि घरेलू कामगारों के लिए एक समान रेट तय किया जाए, ताकि अलग-अलग दरों को लेकर विवाद न हो और कामकाज सुचारू रूप से चल सके।
क्या है बड़ा कारण?
चुनाव के कारण अस्थायी कामगारों की कमी
मांग और आपूर्ति का असंतुलन
शहरी जीवन में घरेलू सहायिकाओं पर बढ़ती निर्भरता
दिल्ली-एनसीआर में घरेलू सहायिकाओं की कमी और बढ़ती सैलरी मांग ने यह साफ कर दिया है कि शहरी जीवन में इन कामगारों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। चुनाव खत्म होने के बाद स्थिति सामान्य हो सकती है, लेकिन फिलहाल लोगों को महंगाई और असुविधा दोनों का सामना करना पड़ रहा है।
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