नई दिल्ली: दिल्ली स्वास्थ्य विभाग में सामने आए 650 करोड़ रुपये के कथित दवा और मेडिकल उपकरण खरीद घोटाले की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। विजिलेंस विभाग की जांच रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड जब्त करने पहुंची टीम को मुख्य आरोपी अधिकारी का कार्यालय खाली मिला। इतना ही नहीं, जांच टीम को आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे जांच में बाधा उत्पन्न हुई।
जांच टीम के पहुंचने से पहले दफ्तर छोड़ गए अधिकारी
सतर्कता निदेशालय की टीम 18 मई को शाम करीब 4:30 बजे स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) पहुंची। यहां से केंद्रीय खरीद एजेंसी (CPA) के प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा से संपर्क किया गया। उन्होंने फोन पर बताया कि वे शकरपुर स्थित कार्यालय में मौजूद हैं। लेकिन जब विजिलेंस टीम शाम 5 बजे कार्यालय पहुंची तो पता चला कि डॉ. रंगा कुछ ही मिनट पहले वहां से निकल चुके थे।
अगले दिन मेडिकल लीव, फोन भी मिला स्विच ऑफ
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, अगले ही दिन यानी 19 मई को सूचना दी गई कि डॉ. रंगा मेडिकल लीव पर चले गए हैं। विजिलेंस टीम ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ मिला। टीम ने उनके पश्चिम विहार स्थित आवास पर भी विशेष दूत भेजा, जहां घरेलू सहायिका ने बताया कि अधिकारी घर पर मौजूद नहीं हैं।
रिकॉर्ड देने से किया इनकार, जांच में अड़ंगा डालने का आरोप
कार्यालय में मौजूद अन्य अधिकारियों डॉ. राजेश कुमार और डॉ. कुसुम अरोड़ा ने भी विजिलेंस टीम को रिकॉर्ड देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि सभी फाइलें डॉ. रंगा की व्यक्तिगत कस्टडी में हैं और उनकी अनुपस्थिति में उन्हें नहीं दिया जा सकता। विजिलेंस ने इसे जांच में जानबूझकर बाधा डालने (स्टोनवॉलिंग) की श्रेणी में माना है। टीम रात 10:15 बजे तक कार्यालय में मौजूद रही, लेकिन फाइलों की सूची पर भी हस्ताक्षर नहीं किए गए।
12 दिन तक रिकॉर्ड जुटाने के लिए संघर्ष करती रही विजिलेंस
एफआईआर के अनुसार, विजिलेंस विभाग ने 19, 21 और 25 मई को लगातार पत्र भेजकर रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग की, लेकिन जरूरी दस्तावेज नहीं सौंपे गए। आखिरकार 29 मई को पूरे मामले को भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) को भेज दिया गया, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई।
इन खरीद मामलों में गड़बड़ी की आशंका
जांच एजेंसियों के अनुसार जिन फाइलों को छिपाने की कोशिश की गई, उनमें कई बड़े खरीद सौदों से जुड़े रिकॉर्ड शामिल हैं। इनमें 2.5 रुपये के ORS पैकेट को 15 रुपये में खरीदने, 10 लाख रुपये की पोर्टेबल एक्स-रे मशीन को 33 लाख रुपये में खरीदने, अस्पतालों के लिए महंगे दामों पर बेडशीट और लिनेन की खरीद, तथा एनेस्थीसिया स्टेशन और सी-आर्म मशीनों की खरीद में कथित अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।
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