हिमाचल सचिवालय के बाहर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का हल्लाबोल: सरकार को दी चेतावनी…

Himachal Pradesh

शिमला की सड़कों पर गूंजा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आक्रोश
सोमवार (8 जून, 2026) को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की सड़कें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के नारों से गूंज उठीं। ‘आंगनबाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स यूनियन’ के बैनर तले प्रदेशभर से आईं सैकड़ों महिलाएं टालैंड में एकत्र हुईं, जहां से उन्होंने सचिवालय तक एक विशाल आक्रोश रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों ने सचिवालय के मुख्य गेट के बाहर बैठकर सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी लंबित मांगों को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।

क्या हैं मुख्य मांगें? (पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर सुविधाओं की मांग)
यूनियन ने सरकार के सामने अपनी मांगों की एक लंबी सूची रखी है, जिसमें मुख्य रूप से अन्य राज्यों में मिल रहे लाभों को हिमाचल में भी लागू करने की बात कही गई है मध्य प्रदेश सरकार की तर्ज पर मानदेय में सम्मानजनक वृद्धि की जाए। साथ ही आंगनबाड़ी वर्कर्स को क्लास-3 (तृतीय श्रेणी) और हेल्पर्स को क्लास-4 (चतुर्थ श्रेणी) सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, , पंजाब राज्य की तर्ज पर सभी कार्यकर्ताओं को सवैतनिक अवकाश (Paid Leave), स्पेशल मेडिकल लीव (विशेष चिकित्सा अवकाश) और ईएसआई (ESI) जैसी स्वास्थ्य बीमा सुविधाएं प्रदान की जाएं।

“काम अनेक, दाम कम”—11 जुलाई को मनेगा काला दिवस
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता यूनियन की राष्ट्रीय महासचिव ऊषा रानी ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सरकार को सीधे शब्दों में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि आज पूरे प्रदेश में केवल एक दिन की सांकेतिक हड़ताल की गई है। यदि सरकार ने उनकी जायज मांगों पर जल्द ही कोई सकारात्मक और लिखित निर्णय नहीं लिया, तो 11 जुलाई को पूरे हिमाचल प्रदेश में ‘काला दिवस’ मनाया जाएगा और इस आंदोलन को उग्र रूप दिया जाएगा।

जेब से मोबाइल खरीदने और रीचार्ज करने की मजबूरी
महासचिव ऊषा रानी और अन्य पदाधिकारियों ने सरकार की नीतियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपनी जमीनी समस्याओं को उजागर किया: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों के पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य ट्रैकिंग और प्री-स्कूल शिक्षा जैसे बुनियादी काम संभालती हैं। इसके अलावा सरकार के हर सर्वे और डिजिटल काम का बोझ भी उन्हीं पर होता है, लेकिन इसके बदले उन्हें महज ₹10,000 प्रति माह का नाममात्र मानदेय दिया जा रहा है।

    डिजिटल काम का अतिरिक्त खर्च: सरकार सारा काम ऑनलाइन करवा रही है, लेकिन कार्यकर्ताओं को मोबाइल फोन अपनी जेब से खरीदना पड़ रहा है। विभागीय रीचार्ज के लिए मिलने वाली ₹155 की राशि आज के दौर के इंटरनेट पैक के लिए बेहद नाकाफी है।

    महंगाई के दौर में चौतरफा मार
    यूनियन के नेताओं का कहना है कि आज के समय में जब रसोई गैस, राशन और बच्चों की पढ़ाई इतनी महंगी हो चुकी है, तब ₹10,000 में किसी परिवार का गुजारा करना असंभव है। कार्यकर्ताओं ने साफ किया कि वे अब और अधिक शोषण बर्दाश्त नहीं करेंगी। यदि प्रशासन ने उनके सब्र का इम्तिहान लेना बंद नहीं किया, तो आगामी दिनों में पूरे प्रदेश की बाल विकास परियोजनाएं और आंगनबाड़ी केंद्र अनिश्चितकालीन समय के लिए ठप कर दिए जाएंगे।

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